Paras Kuhad

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कराह

प्रेम कर भले, .... रब को पाले
बैर रख भले... जल जा ... मन को दे जाने
कर ले .. कर ले , उसको इतना कर ले
जब बेठ अँधेरे में, आँख जो खोले
सुलगता हुआ कुछ तो मिलेगा
तुझको .....
जिसने तपाया था, राख में भी आ ..पाले

ख़ुशी का क्या है, एक जो भ्रम है
और वो दूजा... जो भ्रम में डाले
हो लेगा एक पल में उसका...
आजा अन्दर के अँधेरे में
दूजे में ... वो खुद तुझको अँधेरे में डाले

प्रेम, बैर....अपना या कोई गैर
सब सुलगते है ... एक..
चमकती रौशनी में
किसी को ना कुछ जान पड़ता है
बस टपकेंगे कुछ बूंद आंसू के
वो एक तलब है ...
शायद किसी के ना होने की
या शायद कोई हो ... ऐसे की

बंद आँखों में बहकते हुए सारे .. सब
एक मुस्कराहट में इतनी सरलता से
बह ... जायेंगे
आन पड़ेगा .. कभी जान पड़ेगा
क्या था वो ... क्यों किया मैंने ..
कुछ नहीं आने दे !

बात बातो की हमेशा रहेगी
आज कल और फिर परसों
या उस से पहले ...
खाक तो होना ही था ..
फिर बीता याद आता है
तय करना होता है
शायद पहले ..
जब खाक होगा.. तो सोचना ना पड़े ..
मुझसे क्या छुटा था

बस वक़्त की ही तो बात होती है
कुछ देखते है ... और जब
तू करता है ... तो कुछ कहते है
क्या फरक है ?
सब अब उस ..रौशनी में सुलग रहे है
वो जलाके जलते है .. तू जलके जल रहा है

कभी..... एक रचना सिर्फ ढोंग की होती है
किसी से पूछो तो उसे सोचना होता है ..
फिर सोचता हूँ .. सीधा जवाब तो ..
जबान पर होता है ..
फिर क्यूँ ... !

बह गया सब .. पर कुछ था नहीं मेरा
जो मेरा था .. वो एक मेरा ही ले गया
ऐसा होता है .. जब वो मेरा .. मेरे बाहर होता है
गए हुए में .. अब मैं क्यों मेरा ढूढू
सब संग ही तो ..सुलग रहे है

मुड के जब पीछे देखता हूँ तो
सुलगती रौशनी अलाव बन जाती है
कडकती ठण्ड में मन को अजीब सा ...
आराम देती है..
पर ठण्ड तो मौसमी है ..
जब तक काम ना करूँ
अगली गर्म तक ..
जब तक खुद ना तपता रहूँ

कभी.. कभी सुलगते हुए को
देखने में कुछ बुरा नहीं है
देखना भी चाहिए..
कितने मौसम पार किये है
बरसती बूंदों में .......
खुद ने भी कुछ दान किये है

महक तो बसंत है
प्रेम एक बहक है..
ख़ुशी में एक ललक है
उसका अगला भी आता है
हर किसी को कुछ ऐसा ..
लिखवा जाता है
ले ..
तू पढ़ ले इसी मौसम में
अलाव तो अभी.. अभी सुलगा है
पर वो मेरा है
तेरा कुछ नहीं है ..
तू बस ताप रहा है ..
ताप ले .. ..और चला जा

..paras

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