Paras Kuhad

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Nostalgia

खुद से थोडा खुद को मांगता हूँ..
याद जो चढ़ती है तो नज़र मांगता हूँ ...
जो गुज़रा, वो अब सफ़ेद सा है ..
पोतना है मुझे,
इसलिए यादो से अब रंग मांगता हूँ ..

खाक मिट्टी से जो उठा था ...
रौंद हवा को रौब मांगता हूँ ....
बस गूंज रह जाएगी मेरी आवाज़ दूर तक ,
इसलिए ...
चुपचाप ज़मीन से जड़ो को फिर मांगता हूँ

सुनी रेत को उडाती हवाए नाचती है ...
सपाट आसमान से बारिशें मांगता हूँ ...
पर ताकने में वक़्त बहुत जाया होता है...
खुद बरसना है मुझे, इसलिए अभी
निकलने की एक डगर मांगता हूँ

जब तक यहाँ हरे थे, तब तक ठीक था ...
गिरे हुए पत्तो से अब वो पेड़ मांगता हूँ ...
देखने पे दूर तक कोई एक नज़र नहीं आता ...
नए तो लग जायेंगे ..
पर ओट में फिर वही छावं मांगता हूँ ..
..paras

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