Paras Kuhad

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Likh de Mujhe

देखा कोई खाली पन्ना
खूब उतारा मैंने लिख
सोचूं मैं ख़ुद हूँ कोरा
मेरा बिम्ब नक़ल हो जैसे
अब मिले कोई ऐसा
जो लिख दे मुझे ...

खामोश मैं रहूँगा
कभी कुछ ना कहूँगा
मेरी जबान वो आंखे
देखे और कह जाए
वो लफ्ज़ जो अनकहे है
और बस लिख दे मुझे ।

करीने से सजी है यंहा
कांच की ये टुकडियां
खुब चमक ही चमक
थोड़ा ऊपर से जो गिरे
वो टुकड़े और थोडी छनक
हु मैं भी अब और हमेशा बिखरा
हो जो समेटे और लिख दे मुझे।

प्यास भी अजीब होती है
लगे तो नाश करती है
बुझी तो मीठी कयास बनती है
वो ओस की बूंद जो रहे
हर तिरछी तीखी कोर पे
जो उतरे तो लिख दे मुझे।

गुमराह हो अंधेरे मैं
भटक के जो घूमता हूँ
खूब रौशनी है मेरे पास
क्यों करूँ पता है कंहा मुड़ना
वो आए और मोड़ बदल दे
रौशनी हो और लिख दे मुझे।

आस के गीत जो गाऊं
क्या सोच हो गई ऐसी
सोचूं कोई जोड़ ना बांधू
फिर भी मचल जाता हूँ
हर आशा का निर्णय होता है
पर धीरज की डोर मैं
मुझे बांधे और लिख दे मुझे।

मेरी पीडा ना कोई नयी
ऐसी जैसे औरों की पीर मैं
जैसे मैं तकूँ वो भी ताकें
सोचे उसे जो उनमे झांके
नही है तो बनाये उसे जाके
वो जो सब हर ले और लिख दे मुझे।

सुख के कंठ हार गए
शायद अब कुछ ना मांगे
गीत वो जो कभी थे सुरीले
बिन साज मैं क्या गाऊं
खोजु वो राग जो यंहा है
बस ताल दे और लिख दे मुझे

...पारस

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