Paras Kuhad

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मनु मानस

आँखों के बंद दायरे में
कोई अहसास सा ना है
बस एक मुस्कान की चमक
दिल में घर कर जाती है...

जब मेरी परछाई मुझसे घबराती है
एक गुम्बद सर पे आ बनता है
इतना बड़ा इतना विशाल
फिर सूरज की तपन मिट जाती है ...
परछाई नहीं, उसकी शीतल मिल जाती है

आती हुई आंधियों के डर से
जब घबरा के आंखे बंद कर लेता हूँ
एक नरम मुस्कान बारिश बन आती है
फिर आंखे खुली होती है बहती हुई आंधी में
बरसी हुई रेत ... एक महक बन जाती है

आते जाते बवंडरो में डर लगता है
उनसे मिलके खुद की हस्ती गुम ना हो जाए
पकड़ के उसका सहारा, वही रहता हूँ बनके
खुद एक बवंडर, फिर कितने आये जाए...
घुमाव कितने घुरीले, खुद एक लकीर बन जाती है ।

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