Paras Kuhad

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चाह

मैं बीत जाना चाहता हूँ
हंसी के गलियारों में
बहा के ले जाती है
रह रह के ठंडी हवा
वहां मुझ को..

कुछ मुस्काने दबी पड़ी है
वंहा जैसे अभी , वो वहीँ है
पलको भीतर जिन्दा है
दौड़ते हुए बातें करता हूँ
दूर हूँ, कंही साथ लेके चलता हूँ

जान पड़ता है, जैसे वहीँ है सब
बस थोड़ी सी देर हो गयी
मैं गया नहीं , पर ...
वक़्त के थपेड़े लगते रहते है,
फिर , बदलना तो मेरी भी आदत है

शुरू से जब पैदा होता हूँ
हर चीज़ पीछे छूट जाती है
ये तरीका किसी ने दिया है
की.. बदलने की चाहत में
पूरा बीत जाता हूँ .

  • Manthan
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wow, boss. i dnt kn tht u r 1

Anonymous — Sun, 10/17/2010 - 12:05

wow, boss. i dnt kn tht u r 1 of the best poet in the world.

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heh

pkuhad — Sun, 10/17/2010 - 13:20

:)

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