Paras Kuhad

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कहीं ऐसे

कहीं ऐसे जाना
की दिल के कौने में कहीं जो सच्चाई छुपी है
वो सच्ची है...
उसी को लेके तराशने का मौका ढूढ रहा हूँ
मिली तो यकीन है ख़त्म न होगी
बस मिले तो सही

तलाश ही ऐसी है
भले ही नज़रे बंद कर के
अंधेरो में नज़ारे घूमता हूँ
रौशनी अन्दर की आवाज़ देती है
देखने को अँधेरे भी खूब है
फिर नहीं दिखी वो तो
सुन लूँगा उसे ..

यकीन जज्बात से पैदा होता है
खुदा का खुद पता नहीं है
बस सुना है की होता है
वो यकीन ना में करते है
और मैं होने में
फरक कुछ नहीं है
उन्हें बैठने में तसल्ली है
और मुझे ढूढने में

खुद तलाश का पता हो तो
असर जल्दी ख़त्म हो जाता है
कहते है की
वंहा पहुँच के जन्नत नसीब होती है
अब और क्या कहूँ
चला जा रहा हूँ
इतने में ही जन्नत का मेहराब
दिखाई जान पड़ता है

..paras

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