Paras Kuhad

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ऐ मौला

दूर हरियाली में मेहनत करे, उस से धुल दो शब्द मांगे
हरों को वो आबाद करे, लौटा उसे ढाणी दे मौला !

रेत की सपाट चादर पे, हवाए रेंग रेंग चली गयी
अब मेरी नज़रे दौड़ती है, उस पे वो दो पाग बना दे मौला

जूनून विदा कर देता है, धरती आस लगा लेती है
अब तो खूब बरस भी गया, प्यासों को वापिस बुला ले मौला

उजड़े उजाड़ में आते है , बस देख देख के जाते है
पता वहीँ का देती हूँ, उनको भी आबाद बना देगा मौला

मेघ खूब उमड़ आते है तो क्या, प्यास वहां क्या लगती नहीं
बंज़र पे लगा दे तू पौधा, प्यास का मतलब बता दे मौला

सांझ तेरी थली पे नित आऊ, तेरा दिया रोज़ जलता है
मंदिर मस्जिद रोज बेठता है, खुद को दिलो में बसा दे मौला

दर पे एक दिन भी बाती मैंने न जलाई, आने वालो की कमी नहीं
तेरा घर जिसने ना भी देखा, उनके भी दुःख मिटा दे मौला

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